Tuesday, June 18, 2024
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क्षमताएं हैं असीम, बस हौंसलों की उड़ान चाहिए

महिला दिवस पर विशेष
दर्पण व्यू संवाद
आगरा। महिलाओं खुद को ेसाबित करने के बेहद जागरूक है। महिला दिवस के दिन महिलाओं की उपलब्धियों और राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों में अपने अधिकारों की लड़ाई में वे कितनी दूर आ गई हैं, इसका जश्न मनाया जा रहा है। हम सभी जानते हैं कि दुनिया महिलाओं के बिना नहीं चल सकती है। यह उनके प्रयासों की सराहना करने का दिन है। बड़े और छोटे संगठन महिलाओं को यह दिखाने के लिए एक साथ आते हैं कि वे आज के समाज में कितनी मूल्यवान हैं। ताजनगरी में बड़ी संख्या में ऐसी महिलाएं हैं, जिन्होंने आत्म निर्भर बनकर मौजूदा परिस्थितियों का सामना कर खुद को एक समान कतार में खड़ा किया है। हिन्दी दैनिक समाचार पत्र दर्पण व्यू ने शहर महिलाओं ने अर्न्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर उनका नजरिया जानने का प्रयास किया है।

 

भले ही महिलाओं को अब तक लोग कम ही आंक रहे थे, लेकिन मौजूदा परिस्थियों में महिलाओं ने अपनी सफलता की इबादत भी खुद लिखी है। आज महिलाओं को स्वयं अपना और फिर दूसरों का भविष्य बनाने की दिशा में काम करना होगा। बागपत मूल की उषा मलिक का वर्ष 2008 में पुलिस सेवा में एसआई के पद पर चयन हुआ है। 2018 में इंस्पेक्टर बनने का मौका मिला। वे आज परिवार और पुलिस सेवा के बीच सामंजस्य बनाकर काम कर रही हैं। वे कहती हैं कि परिवार और विभागीय सहयोग के बिना यह मुमकिन नहीं है।
उषा मलिक, प्रभारी निरीक्षक, थाना जीआरपी, आगरा फोर्ट

 

 

महिलाओं को अपने हक के लिए पहले खुद से लड़ना होगा, ताकि वह दुनिया से लड़ने में मजबूत हो सके। स्वयं को अपना आत्मसम्मान बनाए रखने के लिए जीवन में सशक्त होना होगा। महिलाओं के रूप में लिया जाने वाला पहला महत्वपूर्ण कदम आत्मविश्वास बढ़ाकर आत्मसम्मान हासिल करना, अपना महत्व समझना एवं अपनी देखभाल कर अपना सम्मान करना है। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वर्षों से काम कर रहीं प्रतिमा भार्गव। जेल में बंद महिला बंदियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जेल में सिलाई मशीनों देकर बंदियों को सिलाई का प्रशिक्षण लेने में मदद की है। अभी तक कल्याणम् फाउन्डेशन के जरिए उन्होंने 20 लड़कियों की शादी में भी संभव मदद की है। जेल में इंसीनेटर (सेनेटरी पेड डिस्पोजल मशीन) मशीन को भी उन्होंने भेंट की।
प्रतिमा भार्गव, अध्यक्ष, कल्याणम् फाउन्डेशन

आपको अपने अधिकार मालूम होने चाहिए। महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए एक दिन पर्याप्त नहीं। महिला दिवस हमें केवल यह याद दिलाता है कि महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए हम सभी को कहीं न कहीं से शुरूआत करनी होगी। आत्मनिर्भर बनने की दिशा में चिंतन और मंथन करने की आवश्यकता है। अपने आपको आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में शुरू से लगन के साथ काम किया। तीन वर्ष की आयु से डांस में रूचि होने के कारण डांस की दुनियां में ही कैरियर बनाया। इसी क्रम में कई समाजसेवी संस्थाओं के साथ जुड़ कर भी कर किया।

– एकता जैन, समाजसेविका

 

महिला दिवस का औचित्य तब तक प्रमाणित नहीं होता जब तक कि सच्चे अर्थों में महिलाओं की दशा नहीं सुधरती। वास्तविक सशक्तीकरण तो तभी होगा जब महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होंगी, और उनमें कुछ करने का आत्मविश्वास जागेगा। कोई भी काम मुश्किल नहीं है बस करने का जज्बा होना चाहिए। बैंक अधिकारी प्रीति ने पूर्व में कई बच्चों को शिक्षा दी है, इसी दौरान उनका सिलेक्शन बैंकिंग सेवा में हुआ है। उनकी बैंकिंग की सेवा को देख उनके ससुराल और मायका पक्ष के सभी लोग सहर्ष सहयोग करते हैं और पति ने भी खुद की सरकारी नौकरी छोड़कर व्यवसाय कर रहें हैं।
प्रीती भारती, बैंक अधिकारी,
मानव संसाधन विकास विभाग, सेन्ट्रल बैंक

लड़कियों की स्थिति में सामाजिक तौर पर बहुत सुधार हुआ है फिर भी कुछ लोगों के हिसाब से महिलाएं आज भी सिर्फ अबलाएं हैं पर मुझे गर्व है कि आज के समय में महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पुरूषों से कम नहीं हैं। आमतौर पर लोग महिलाओं को घर चलाने वाली के रूप में देखते हैं, जबकि महिलाओं में क्षमता तो देश चलाने की भी है। राजस्थान के अलवर जिले की मूल निवासी मनीषा मीणा ने वर्ष 2016 में सहायक चालक के पद पर रेलवे को ज्वाइन किया था। वे बतातीं है कि उनके माता पिता ने बड़ी परेशानी के साथ पढ़ाया लिखाया था। अपनी सफलता का श्रेय भी माता-पिता को देतीं हैं। एक साल पहले शादी होने के बाद परिवार और रेल सेवा को बड़ी जिम्मेदारी के साथ संभाला है।
मनीषा मीणा, सहायक लोको पायलट,
आगरा छावनी

 

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