Saturday, June 22, 2024
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रावण की भी हुई जय-जयकार, किया यज्ञ, कन्याओं का पूजन

सारस्वत ब्राह्मण लंकाधीश को मानते हैं अपना वंशज
पुतला नहीं जलाते, की जाती है रावण की पूजा-अर्चना

आगरा। एक तरफ जहां जगह-जगह रावण के पुतले फूंके जा रहे थे, वहीं एक कार्यक्रम ऐसा भी हुआ, जहां रावण की पूजा-अर्चना हुई। रावण के स्वरूप ने कन्याओं का पूजन किया। उनके पैर धोए। सारस्वत ब्राह्मण समाज रावण को अपना वंशज मानता है। इस कारण समाज के लोग पुतला नहीं जलाते, बल्कि रावण की जय-जयकार करते हैं। इसी क्रम में ललंकापति लंकेश जिंदाबाद के नारों के बीच रावण के स्वरूप ने भगवान शिव की आरती और हवन के बाद कन्याओं के पैर धोकर उनका पूजन किया। जगह-जगह रावण को बुराई का प्रतीक मानते हुए रावण के पुतले को जलाया जाता है, लेकिन आगरा में सारस्वत ब्राह्मण समाज के द्वारा रावण का दहन करने की बजाय उसकी पूजा की गई। लंकापति दशानन रावण महाराज पूजा सामिति द्वारा कैलाश घाट पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। भगवान वृद्धेश्वर महादेव मंदिर में रावण के स्वरूप के साथ शिव तांडव स्त्रोत का पाठ किया गया और भगवान की आरती की गई। इसके बाद रावण के स्वरूप ने कन्याओं के पैर धूल कर उनका पूजन किया और भोजन करवाया। इसके साथ ही उन्होंने भगवान से प्रार्थना करी की लोगों को रावण के बारे में भ्रामक बातें भूलकर उनका सम्मान करना सीखना चाहिए। रावण वध के बाद खुद भगवान राम ने लक्ष्मण को रावण के पैरों की तरफ खड़े होकर ज्ञान लेने को कहा था। आश्रम के संचालक शिव प्रसाद शर्मा ने कहा की रावण ने सीता माता को कभी नजर उठा कर नहीं देखा, हमेशा उनकी नजर माता के पैरों पर ही रहती थी। भगवान हनुमान के दर्शन करने के लिए ही उन्होंने लंका दहन की लीला करवाई। उन्होंने अपनी बहन के सम्मान के लिए भगवान से युद्ध लड़ने तक की ठान ली। रावण के जीवन को पढ़ने के बाद एक अच्छा भाई और समाज का एक अच्छा व्यक्ति बनने का संदेश मिलता है। लोगों को रावण के बारे में सही ज्ञान अर्जन की जरूरत है। एडोवोकेट उमाकांत सारस्वत, रावण बने डॉ. मदन मोहन सारस्वत का कहना है की महाज्ञानी रावण ने राम के द्वारा रामेश्वरम की स्थापना के बाद पूजा की क्रियाएं कराई थी। उनका कहना है कि रामायण पढ़कर रावण की अच्छाइयों को आत्मसात करना चाहिए। उनके पुतले का दहन कर पर्यावरण प्रदूषण फैलाने से अच्छाई की जीत भला कैसे हो सकती है।

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